गुरुवार, 17 मार्च 2016

अनमोल रिश्ता [ लघुकथा ]


आज अनु नवरात्रि की पूजा करने बैठी ही थी ..  उसने जैसे ही दिया जलाया उसकी आँखें नम हो आई और आँसू बह निकले ..
''अभी अभी तो सन्देश आया था उसे .. जानू  जल्दी करो नाश्ता करने के लिए आ जाओ देर हो रही है ऑफिस के लिए ...
हाँ अभी आई बस जोत जगा कर ... उसने भी सन्देश भेज दिया था
हाँ चलो ना ... उसने पूजा से उठते ही सन्देश भेजा ...
हाँ तो चलो ...
और दोनों नाश्ता करने लगते थे ''.......................

कैसा अद्भुत बंधन बन गया था दोनों में ... मीलों की दूरी थी दोनों में ...कभी मिले नहीं थे वो ... फिर भी इतनी नजदीकी का अहसास था दोनों में .. एक अद्भुत रूहानी रिश्ता ..
दोनों एक दूसरे की पल पल की चिंता करते थे बिना इसकी परवाह किये कि आखिर उनके बीच रिश्ता ही क्या था...
 ...रिश्ता ... एक ऐसा शब्द जिसके सामाजिक तौर पर बहुत मायने थे पर रूहानी तौर पर सिर्फ एक दूसरे से यह अटूट प्यार था ,चिंता थी एक दूसरे की ,संभल था एक दूसरे का ,एक आत्मविश्वास था सदा साथ चलने का सब कठिनाईयों का मिलकर सामना करते हुए ...
यह क्यों एक याद बनकर अनु की आँखों के रास्ते टपकने लगे थे जोत जलाते हुए ,,,,
यादें .. शायद हमेशा ही सुकून देती हैं कभी आँसू रूप में बहकर ... कभी जिंदगी में एक सबक देकर ...
अनु के पूजा के समय निकलते आँसू उसकी मन की व्यथा कह गए थे ... उसे याद आ रहा था कोई जिसे उसने पल पल अपने साथ पाया था हर ख़ुशी के गम के लम्हों में .. कोई ख़ास ,कोई अपना ... जब दूरी कभी मायने नहीं बनी थी उसके लिए .. बस ख्वाहिश थी उसे एक पल देख लेने की ...
इतने बरस ऐसे बीत गए थे साथ चलते चलते कि अब उसकी खबर न मिलना उसके लिए नाउम्मीदी का एक ऐसा साया लेकर आया था जो उसके भविष्य के आगे आ खड़ा हुआ था ...
उसे पल पल जरुरत थी उसकी हर फैसले में ... एक नैतिक सहारा था उसका जो छिन गया था ..
पता नही यह आदत बन गई थी उसकी या एक ऐसा भरोसा जो किसी रिश्ते की रस्मों में बंधे बिना प्रगाढ होता जा रहा था |
उसने उसे बहुत सन्देश भेजकर समझाने की कोशिश की थी कि जो भी दुःख आये हैं मिलकर बाँट लेंगे पर एक दूसरे का नैतिक सहारा बने रहेंगे ... ऐसे ही जिंदगी कट जाएगी मिलजुल कर .... दूर रहते हुए भी साथ साथ चलते हुए ...
लेकिन शायद नाकाम रही थी अनु अपने अथक प्रयासों में ...
शायद उसने खो दिया था एक हमसफ़र जिसके साथ रिश्ता नहीं बना पाई थी वो दुनिया की नजरों में ... पर तोड़ भी तो नहीं पाई थी वो उस रिश्ते को जिसका कोई नाम नहीं था पर फिर भी वो .."अनजाना बंधन" ..उसके लिए ''अनमोल रिश्ता '' बन गया था ... जिसमे अनु अपना वजूद खो चुकी थी ...
पर 'उसे' "कोई मिल गया " था ,इसलिए उसे अभी अनु की जरूरत नहीं थी ....
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लेखिका :... सरिता भाटिया ....