गुरुवार, 20 जून 2013

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

इससे पहली पोस्ट में कुछ दोस्त मेरी पोस्ट से आहत हुए हों तो क्षमाप्रार्थी हूँ ,परन्तु ऐसे भाव हरेक के मन में आये होंगे क्योंकि मेरी ईश्वर में परम आस्था है फिर भी मेरे मन में ऐसे सवाल आये |
          मैं मानती हूँ सब पर एक ही शक्ति काम करती है कोई उसे कृष्ण कहे, प्रभु कहे ,अल्लाह कहे ,ईसामसीह कहे, शिव कहे या राम कहे |भगवान सर्वशक्तिमान है, अदृश्य है, अरूप है |क्योंकि भगवान् कण कण में बसता है ,इसलिए मेरा मूर्ति पूजा में विश्वास न होते हुए भी मुझे हर मनुष्य में ,पाषाण में वोह नजर आता है | यहाँ तक मूर्ति पूजा का सवाल है उस सर्वशक्तिमान के सामने अपना दुःख सुनाने के लिए हम सब ने उसकी एक छवि मन में बसा ली है बस वोह ही उसकी मूर्त है |
        दूसरा इस बात को समझना भी जरुरी है ....
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
              जब मनुष्यों के पाप इतने बढ़ जायेंगे तो सृष्टि का विनाश तो होगा ही तभी तो भगवान् स्वयं की सृष्टि करेंगे |
   ईश्वर के वास्तविक स्वरुप को कोई नहीं जानता | बस मेरा यह कहना है कि ईश्वर पर विश्वास हमें दुःख सहने की क्षमता प्रदान करता है और कठिन क्षणों में सांत्वना देता है | फिर भी हमें अंधविश्वासों में नहीं पड़ना चाहिए और आँखें बंद कर अनुसरण न करें ,उसके बारे में जितना जानेंगे उसे उतना ही मानेंगे | अपनी आस्था को कायम रखते हुए धर्म के उत्थान के लिए ही कार्य करें |